Aakhiri Kitaab by Niraj Nidan | The Social House Poetry | Whatashort

44 thoughts on “Aakhiri Kitaab by Niraj Nidan | The Social House Poetry | Whatashort

  1. 😇🙂 vai apne to dil hi chuliya🤗 apka or mera story ak jesahi hai😌😞😞😌💔♥️

  2. मैंने भी कुछ लिखने की कोशिश की है पसंद आये तो जरूर बताइयेगा
    Unhe lgta hai ki hum uhi uhe bhul jayege……
    Bite lmhat ko uhi kho jayege……
    Es bhool me naa rhna mere Mohabbate-E-isq….
    Hum tujhse door ho kr tujhko bhool jayege
    Ager tu dariya hai to hum bhi kasti hai…..
    Hum bhi tujhme doob jayege..

  3. नियति की आगे की कहाँनी कब पूरी होगी

  4. Aree kuch nya sunao sir sab purana repeat kar rhe h baar baar

  5. Mai apka hi video ka wait kr rhi thi.. mujhe apka bhut psnd h . Thankyou social house

  6. Sir, kya bat hai hamesa kuch alage hi padte ho aap 😘😚😍..

    Or sir me bhi try kar raha 2mahino se social house per koi respond hi nahi deta.. please Sir respond . mene social house ko kai bar mail bhi kiya hai fir bhi koi respond nahi aaya ..
    Sir I'm Deepak. Contact 9717677408

  7. बाकी सब तो ठीक है
    पर तेरी एक ख्वाहिश अधूरी रह जाएगी,
    तेरे लब के किनारे वाला तिल
    जो मेरे तिल से मिलती थी,
    अब किसी से कहाँ मिला पाओगी…….

  8. जिसमें फ़ना हैं जज्बातों के कई समंदर
    वही एक कतरा इश्क़ हूँ में…।।@सिंबल

  9. Iiiiiii
    Lllllove.
    You Rukhsar …………

    ……love you so much

  10. True poetry , Delhi ki language me bolu to🤓 Zeher😍🙃

  11. સોરી…કોમુ….મેસેજ કર કર કરુ છું
    😔❤💜

  12. સોરી…..મેસેજ કર કર કરું છું……..
    સોરી ❤💛💜

  13. Sir mujhe bhi social house se jhudna he pleas 🙏🙏🙏🙏🙏🙏🙏help me Mene bhi kuch line likhi he

  14. बहुत दिनों ke बाद सर… आये हो… थैंक्स

  15. काश जागने की तरह
    हमारे पास सोने की भी कोई वजह होती
    एक अरसा हो गया रात को सोए हुए

    जो नहीं है मेरे पास
    वो नहीं है
    सिर्फ इतनी सी बात समझ में क्यों नहीं आती मुझे

    वो सुबह का ख्याल था जो सुबह आया
    रात का ख्याल रात को आता कहा है
    ख्याल ही तो है वो भी सो जाता है

    दिल तो बहुत करता है मेरा की रुक जाऊं
    मेरे हिस्से की ज़मीन भी तो मिले
    कि में ठहर जाऊं
    हर किसी की ज़मीन पर थोड़ी ना रुक जाऊं

    शायद ये वक्त भी उस गुज़रे हुए वक्त की तरह गुज़र जाएगा
    जो गुज़र गया

    काश हमें भी लोगो की तरह जीना आता
    काश ऐसा हो पाता

    मेरे हिस्से में सुकुन लिखना भूल गया
    या फिर लिखना ज़रूरी नहीं समझा

    अगर में इस जलन की जलन से जल कर ज़िन्दा बच गया तो
    क्या बदले में मुझे सुकून मिलेगा

    चलो हमें समझ में नहीं आता लेकिन आप को तो आता है
    वादा कर के तोड़ना
    आप को बहुत अच्छा आता है

    क्या फ़र्क रखा है उन्होंने मुझमें और दूसरो में
    चाहे में तारीफ़ करू या कोई और
    वो एक ही तरह से मुस्कुरा देते है

    एक हद तक ही इन्सान गलतफेमियो में रहता है
    देर से ही सही
    लेकिन फिर हक़ीक़त में भी रहने की आदत हो जाती है

    वो एक इन्सान जो मेरे कहने पर मेरे क़रीब रहा
    वहीं इन्सान दूसरों के कहने पर मुझ से दूर हो गया

    में अपने हिस्से की ज़मीन नहीं छोडूंगा
    तुम अपने हिस्से का आसमान अपने पास रखो

    सुनने को तो पूरी दुनिया सुन लेगी आप की बात
    हमें तलाश उसकी है
    जो बात को समझे

    वो रात का दर्द सुबह क्यों नहीं आता
    मुझसे डरता है या सूरज से जलता है

    तेरे क़रीब कोई और ना आए
    इसलिए हमने अपने साए तक को दूर कर दिया

    में अपने हिस्से की ज़मीन नहीं छोडूंगा
    तुम अपने हिस्से का आसमान अपने पास रखो

    सुनने को तो पूरी दुनिया सुन लेगी आप की बात
    हमें तलाश उसकी है
    जो बात को समझे

    वो रात का दर्द सुबह क्यों नहीं आता
    मुझसे डरता है या सूरज से जलता है

    तेरे क़रीब कोई और ना आए
    इसलिए हमने अपने साए तक को दूर कर दिया

    में अपने हिस्से की ज़मीन नहीं छोडूंगा
    तुम अपने हिस्से का आसमान अपने पास रखो

    सुनने को तो पूरी दुनिया सुन लेगी आप की बात
    हमें तलाश उसकी है
    जो बात को समझे

    वो रात का दर्द सुबह क्यों नहीं आता
    मुझसे डरता है या सूरज से जलता है

    तेरे क़रीब कोई और ना आए
    इसलिए हमने अपने साए तक को दूर कर दिया

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