Hindi Poem: Hum Manbhavan Darbar Hue I हिंदी कविता:: हम मनभावन दरबार हुए I


II INTRO II जिंदगी के सच्चे यार हम हम छल छल छलकता प्यार हुए ना रोके कोई ना टोके कोई हम मनभावन दरबार हुए हम मनमर्जी से उड़ते हैं सागर के तल में डूबते हैं पहाड़ों पर बैठा सूरज बन हम अंधेरे में उगते हैं बस सोच सही संकोच नहीं करुना कि नहीं बाहर हुए वो सच्चे हैं हम भी सच आरोप हम पर नादानी के लोग प्रेम का सागर उछल रहा बुलबुले नहीं हम पानी के हमको ना किनारा है कोई हम दरिया के मजेदार हुए जिंदगी के सच्चे यार हुए
हम छल छल छलकता प्यार हुए ना रोके कोई ना टोके कोई हम मनभावन दरबार हुए ॥२॥ JAY HIND…. VANDE MATARAM….

1 thought on “Hindi Poem: Hum Manbhavan Darbar Hue I हिंदी कविता:: हम मनभावन दरबार हुए I

  1. जिंदगी के सच्चे यार हम

    हम छल छल छलकता प्यार हुए

    ना रोके कोई ना टोके कोई

    हम मनभावन दरबार हुए
    ..!!!

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