Hindi Poem recitation competition (Inspirational poem) “मन की देहरी का दीप”


मन में इक विकार सा है, चहुँदिश इक अन्धकार सा है जन गण को आरोपित करता, हृदय में इक संचार सा है मन के घने तिमिर (अँधेरा) को बस इक लौ दिखाना बाक़ी है मेरे मन की देहरी पर इक दीप जलाना बाक़ी है छल और नैतिकता के मध्य में छिड़ा हुआ इक डिंब (युद्ध) सा है प्रत्यक्ष खड़ा वो दानव मेरे हृदय का ही प्रतिबिम्ब (reflection) सा है भीतर छुपे उस रावण पर प्रतिघात (चोट) लगाना बाक़ी है मेरे मन की देहरी पर इक दीप जलाना बाक़ी है निश्चित हर इक मानव के, मन में केवल तम (अँधेरा) ही नहीं किसी कण में ईश सुशोभित हैं, सम्मोहित किए है अधम (बुराई) कहीं मन-के निर्णय में राम सकल अभिदान (योगदान) बढ़ाना बाक़ी है मेरे मन की देहरी पर इक दीप जलाना बाक़ी है हर राह सरल हो जीवन में, यह किंचित सम्भव ही नहीं राह सत्य की सदा कठिन, मिले मिथ्य (झूठ) का पथ सहज-से ही, नानकवाणी को पथदर्शन सिरमौर बनाना बाक़ी है मेरे मन की देहरी पर इक दीप जलाना बाक़ी है मन मेरा जो हो उज्ज्वल, जग-में सम्भव अंधकार नहीं मेरे-मन से ही हो आरंभित, उस उज्ज्वल जग की किरण नयी अंत: करण में दीप-पर्व का, ये सार समाना बाक़ी है मेरे मन की देहरी पर इक दीप जलाना बाक़ी है मेरे मन की देहरी पर इक दीप जलाना बाक़ी है

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *