Unche Ghor Mandar Ke Andar Rahanvaari |Bhushan |Kavitt|Best Gazal,Poem


ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं। ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं। कंद मूल भोग करैं, कंद मूल भोग करैं, तीन बेर खातीं, ते वै तीनबेर खाती हैं॥ ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहनवारी, ऊँचे घोर मंदर के अंदर रहाती हैं। कंद मूल भोग करैं, कंद मूल भोग करैं, तीन बेर खातीं, ते वै तीनबेर खाती हैं॥ भूषन सिथिल अंग, भूखन सिथिल अंग भूषन सिथिल अंग, भूखन सिथिल अंग बिजन डुलातीं ते वै बिजन डुलाती हैं। ‘भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास, नगन जड़ातीं ते वै नगन जड़ाती हैं।। ‘भूषन भनत सिवराज बीर तेरे त्रास, नगन जड़ातीं ते वै नगन जड़ाती हैं।।

5 thoughts on “Unche Ghor Mandar Ke Andar Rahanvaari |Bhushan |Kavitt|Best Gazal,Poem

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *